अमेरिका ने हर्मुज़ समझौते को खारिज करने के बाद इरान के विदेश मंत्री ने वार्ता की मांग की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े प्रस्तावित समाधान को अस्वीकार कर दिया है; इरान का कहना है कि लाल सागर में तनाव को समाप्त करने के लिए वार्ता ही एकमात्र उपाय है।
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वॉशिंगटन — अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सप्ताह की शुरुआत में तेहरान द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को अस्वीकार करने के बाद, हर्मुज़ की खाड़ी में बढ़ते हुए संघर्ष को समाप्त करने के लिए केवल वार्ता-समाधान ही प्रभावी हो सकता है, यह बात इरान के विदेश मंत्री ने मंगलवार को कही।

ट्रंप के अस्वीकार ने राजनयिक अडचल को गहराया

राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस के ब्रीफिंग रूम में बोलते हुए इरानी प्रस्ताव को अपर्याप्त करार दिया और कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका उन ‘अन्यायपूर्ण समझौतों’ पर समझौता नहीं करेगा, जिन्होंने अमेरिकी समुद्री सुरक्षा को खतरे में डालने की संभावना जताई है। यह अस्वीकरण तब आया जब इरान के विदेश मंत्रालय ने एक प्रारंभिक ढांचा प्रस्तुत किया था, जिसमें नौसेनाई गश्तों की क्रमिक शिथिलता और एक संयुक्त निगरानी तंत्र की स्थापना की मांग की गई थी।

इसके जवाब में, इरान के विदेश मंत्री हौसैन अमीर-अब्दुल्लाहियान ने तेहरान में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि संयुक्त राज्य अमेरिका के इनकार ने राजनयिक समाधान की ओर बढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है। उन्होंने जोर दिया कि इरान शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्ध है और चेतावनी दी कि सैन्य तैनाती की निरंतरता इस महत्वपूर्ण जहाज-यातायात मार्ग को और अधिक अस्थिर कर सकती है।

संयुक्त राष्ट्र दूत ने इरान की ईमानदारी पर सवाल उठाए

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी दूत लींडा वाल्ट्ज़ ने एक अलग बयान में तेहरान की स्थिति का खंडन किया और दावा किया कि इरान ने ईमानदारी से वार्ता नहीं की है। वाल्ट्ज़ ने इरान की अस्वीकार्यता के प्रमाण के रूप में हाल ही में किए गए इरानी मिसाइल परीक्षणों और खाड़ी में अतिरिक्त नौसेनाई संपत्तियों की तैनाती का हवाला दिया।

दूत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अपील की कि यदि इरान खाड़ी के माध्यम से व्यापार की स्वतंत्र प्रवाह को खतरे में डालने वाले कार्रवाइयों में लगे रहता है, तो अतिरिक्त प्रतिबंधों पर विचार किया जाए, जिसके माध्यम से वैश्विक तेल शिपमेंट का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा होता है।

क्षेत्रीय प्रतिक्रियाएं और आर्थिक जोखिम

फारसी खाड़ी के समुद्र तट पर स्थित देशों, जिनमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं, ने बढ़ती तनाव पर चिंता व्यक्त की। सऊदी विदेश मंत्री राजकुमार खालिद अल-फैसल ने चेतावनी दी कि हर्मुज़ गलियारे में किसी भी बाधा का ‘वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर गंभीर प्रभाव’ पड़ेगा।

विश्लेषकों का कहना है कि एक लंबा संघर्ष तेल की कीमतों को बढ़ा सकता है, जिससे भारतीय डीज़ल लागत में प्रति बैरल ₹300–₹500 तक की वृद्धि हो सकती है, क्योंकि देश मध्य पूर्व के कच्चे तेल आयात पर निर्भर है।

प्रस्तावित सौदे का पृष्ठभूमि

मसौदा समझौता, जिसे पहली बार 22 सितंबर को इरानी अधिकारियों ने सार्वजनिक किया, ने तीन चरणों का विवरण दिया: तत्काल युद्धविराम, नौसेना गतियों के लिए संयुक्त सत्यापन व्यवस्था, और आर्थिक सहयोग के लिए दीर्घकालिक ढांचा। तहरान ने तर्क दिया कि यह योजना सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करेगी और दोनों पक्षों को अपने क्षेत्रीय जल पर संप्रभु अधिकार बनाए रखने की अनुमति देगी।

हालाँकि, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह प्रस्ताव इरान के ‘क्षेत्रीय प्रॉक्सी बलों के समर्थन’ और उसके ‘बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम’ को संबोधित करने में विफल रहा। प्रशासन ने संकेत दिया कि भविष्य की किसी भी चर्चा के लिए व्यापक सुरक्षा पैकेज की आवश्यकता होगी, जिसमें इरान के मिसाइल विकास पर प्रतिबंध शामिल हैं।

संभावित आगे के मार्ग

प्राथमिक स्रोत एवं आधिकारिक दस्तावेज़

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