नई दिल्ली — भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इस वर्ष अपनी नीति रेपो दर को दो बार बढ़ाने की संभावना रखता है, जैसा कि एक नवीन विश्लेषण में संकेत दिया गया है, और सितंबर के अंत तक दर 5.75 % तक पहुँचने की उम्मीद है। 29 सितंबर 2026 को द इकोनॉमिक टाइम्स द्वारा प्रकाशित इस रिपोर्ट
मुद्रास्फीति की गतिशीलता
कोर मुद्रास्फीति, जिसमें अस्थिर खाद्य और ईंधन मूल्य शामिल नहीं हैं, पिछले दो तिमाहियों में लगभग 4.5% पर स्थिर रही है। प्रमुख उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) 2026 के अधिकांश महीनों में 5% से ऊपर रहा है। आरबीआई का मुद्रास्फीति‑लक्ष्यीकरण ढाँचा तब हस्तक्षेप करने का निर्देश देता है जब CPI लगातार ऊपरी सीमा को पार करता है। अनुमानित ब्याज दर वृद्धि का उद्देश्य मुद्रास्फीति को लक्ष्य सीमा के भीतर लाना है, जबकि खर्च में तेज संकुचन से बचना है।
नीति समिति की निर्णय‑निर्माण प्रक्रिया
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) हर दो महीने में मिलती है। समिति के निर्णय थोक मूल्य मुद्रास्फीति, खुदरा मुद्रास्फीति, रोजगार डेटा और वैश्विक ब्याज दर आंदोलनों सहित कई सूचकों पर आधारित होते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि MPC नवीनतम CPI आंकड़ों, रुपये के रुख और वैश्विक विकास के दृष्टिकोण को ध्यान में रखेगी, इससे पहले कि वह ब्याज दर पथ को अंतिम रूप दे।
बाजार की प्रतिक्रियाएँ
बांड बाजारों ने वर्ष के अंत तक 5.75% रिपो दर की संभावना को मूल्यांकित किया है। 10‑वर्षीय सरकारी बांड का यील्ड वर्ष की शुरुआत में 5.8% से बढ़कर 6.2% हो गया है। वाणिज्यिक बैंक उच्च नीति दरों की प्रत्याशा में अपनी शुद्ध ब्याज मार्जिन समायोजित कर रहे हैं, जिससे कॉर्पोरेट और उपभोक्ता ऋण मूल्य निर्धारण पर प्रभाव पड़ सकता है।
निष्कर्ष
आरबीआई की संभावित दो‑चरणीय ब्याज दर वृद्धि, लगातार मुद्रास्फीति और वैश्विक उच्च दरों के माहौल में मौद्रिक नीति को सख्त करने के प्रति सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाती है। समिति भविष्य की दर समायोजन के समय और परिमाण को तय करने के लिए मुद्रास्फीति प्रवृत्तियों और वैश्विक विकासों पर नज़र बनाए रखेगी।