नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक याचिका खारिज कर दी, जिसमें अदालत से स्कूलों को निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि वे अपनी दैनिक सुबह की सभाओं के दौरान संविधान की प्रस्तावना का पाठ करें। इस मामले की सुनवाई पूर्ण पीठ (Full Court) के समक्ष हुई, जिसने पाया कि याचिका में न्यायिक हस्तक्षेप के लिए पर्याप्त कारण स्थापित नहीं किए गए हैं, इसलिए अदालत ने कोई निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।
याचिका की पृष्ठभूमि और अदालत का तर्क
यह याचिका अभिभावकों के एक समूह और एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रस्तावना का नियमित पाठ छात्रों में संवैधानिक मूल्यों को जड़ने और राष्ट्रभक्ति को बढ़ावा देने में सहायक होगा। याचिकाकर्ताओं ने एक मंडाटस (Mandamus) के आदेश की मांग की, जिसके तहत केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और राज्य शिक्षा प्राधिकरणों को सभी स्कूलों में मानक सुबह की सभा के प्रारूप में प्रस्तावना को शामिल करने का निर्देश दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने उल्लेख किया कि शिक्षा नीति, जिसमें स्कूल सभाओं की सामग्री भी शामिल है, CBSE और राज्य शिक्षा विभागों के प्रशासनिक दायरे में आती है। अदालत ने अवलोकन किया कि मौजूदा CBSE दिशानिर्देश पहले से ही स्कूलों को राष्ट्रीय एकीकरण और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सभाओं का आयोजन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, बिना किसी विशिष्ट पाठ को निर्धारित किए। इस प्रकार, अदालत ने निर्णय लिया कि याचिकाकर्ताओं ने यह प्रदर्शित नहीं किया कि वर्तमान ढांचा किसी कानूनी या संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है।
कानूनी संदर्भ
यह निर्णय एक श्रृंखला के फैसलों के बाद आया है, जिनमें शीर्ष अदालत ने स्कूल प्रशासन से जुड़े मामलों में संयम प्रदर्शित किया है। पिछले फैसलों में, अदालत ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर जोर दिया, यह कहते हुए कि अदालतों को तब तक पाठ्यक्रम की सामग्री पर सूक्ष्म नियंत्रण (micromanage) नहीं करना चाहिए जब तक कि मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन प्रदर्शित न किया जाए। वर्तमान खारिजगी उसी न्यायिक विवेक (jurisprudence) के अनुरूप है, जो यह दृष्टिकोण मजबूत करता है कि शिक्षा में नीति निर्माण सर्वोत्तम रूप से कार्यकारी और कानूनी निकायों को छोड़ा जाना चाहिए।
बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत, स्कूलों को शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण के अनुकूल वातावरण प्रदान करना आवश्यक है। इस अधिनियम में सभाओं के लिए कोई विशिष्ट सामग्री अनिवार्य नहीं की गई है, जिससे यह मामला शिक्षा प्राधिकरणों के विवेक पर छोड़ा गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने दोहराया है कि सभाओं की प्रथाओं में कोई भी संशोधन CBSE और राज्य बोर्डों के भीतर नीतिगत विचार-विमर्श से ही उत्पन्न होना चाहिए, न कि अदालत के आदेशों से।
हितधारकों की प्रतिक्रियाएँ
शैक्षणिक विशेषज्ञों ने इस निर्णय का स्वागत किया, यह बताते हुए कि न्यायालय द्वारा एकसमान अभ्यास को अनिवार्य न करने से विद्यालयों को अपनी सभाओं को स्थानीय संदर्भों के अनुरूप ढालने की लचीलापन मिलता है। एक वरिष्ठ शिक्षा विश्लेषक ने प्रेस को बताया कि यह निर्णय राष्ट्रीय मूल्यों को क्षेत्रीय सांस्कृतिक विविधता के साथ संतुलित करने की महत्ता को रेखांकित करता है।
याचिका दायर करने वाले समूह के प्रतिनिधियों ने निराशा व्यक्त की, यह कहते हुए कि न्यायालय ने युवा नागरिकों में संवैधानिक जागरूकता को सुदृढ़ करने का अवसर चूक दिया। उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से नीति समीक्षा के लिए संपर्क करने की योजनाएँ बताई।
CBSE और राज्य बोर्डों पर प्रभाव
CBSE ने पहले ही ऐसे दिशानिर्देश जारी किए हैं जो विद्यालयों को राष्ट्रीय दिवस मनाने और नागरिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों को शामिल करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बोर्ड का नवीनतम सर्कुलर, अगस्त 2026 में जारी किया गया, यह दोहराता है कि सभाओं में गीत, भाषण और राष्ट्रीय उपलब्धियों पर चिंतन शामिल हो सकता है, परंतु किसी विशेष पाठ को अनिवार्य करने से परहेज़ करता है।
राज्य शिक्षा विभाग संभवतः CBSE ढाँचे का पालन जारी रखेंगे, इसे क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालते हुए। सर्वोच्च न्यायालय के अस्वीकृति का अर्थ है कि भविष्य में अनिवार्य प्राक्कथन पाठ के लिए किसी भी प्रयास को न्यायिक मार्ग के बजाय विधायी या प्रशासनिक चैनलों के माध्यम से आगे बढ़ाना पड़ेगा।
संविधान शिक्षा पर व्यापक बहस
इस मामले ने विद्यालय पाठ्यक्रम में संवैधानिक ज्ञान को समाहित करने के सर्वोत्तम तरीकों पर चर्चा को पुनः प्रज्वलित किया है। जबकि कुछ नागरिक समाज समूह संविधान के प्रावधानों के अधिक स्पष्ट शिक्षण की वकालत करते हैं, अन्य तर्क देते हैं कि विषयों में संवैधानिक विषयों को समेकित करने वाला संतुलित दृष्टिकोण यादृच्छिक पाठ से अधिक प्रभावी हो सकता है।
नीति निर्माताओं से अपेक्षा है कि वे शिक्षकों, कानूनी विशेषज्ञों और बाल अधिकार समर्थकों के साथ आगामी परामर्शों में इस विषय की समीक्षा करेंगे। शिक्षा मंत्रालय ने नवंबर 2026 में हितधारक बैठक की घोषणा की है ताकि नागरिक शिक्षा को बढ़ाने के प्रस्तावों पर विचार किया जा सके।
प्राथमिक स्रोत एवं आधिकारिक दस्तावेज़
- Supreme Court dismisses plea seeking recitation of Preamble of Constitution during morning
- Supreme Court dismisses plea for recitation of Preamble during morning assembly in schools
- SC dismisses plea seeking recitation of preamble during morning assembly in schools – TheP
- High Court Dismisses Plea Against Secretariat at Pattinapakkam as Withdrawn – Deccan Chron