Supreme Court backs out of JPC meeting on ONOE panel, panel chief says

The apex court initially consented to a Joint Parliamentary Committee meeting on the ONOE panel, then rescinded, prompting criticism from former judges.
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नई दिल्ली — रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय को रद्द कर दिया, जिसे उसने उसी दिन पहले लिया था, जिसमें राष्ट्रीय उम्बुड्समैन और नैतिकता कार्यालय (ओएनओई) पैनल के संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से मिलने का निर्णय लिया गया था।

भारतीय मानक समय (आईएसटी) सुबह 09:30 बजे, न्यायालय के रजिस्ट्री ने पुष्टि की कि जेपीसी के साथ एक बैठक निर्धारित की गई है, जिसमें पैनल की निगरानी कार्यों पर चर्चा की जानी थी। इस पुष्टि को न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर पोस्ट की गई एक संक्षिप्त सूचना के माध्यम से संदेश दिया गया था।

दो घंटों के भीतर, वही सूचना वापस ले ली गई और न्यायालय ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया कि बैठक नहीं होगी। रद्दीकरण के लिए बयान में कोई कारण नहीं दिया गया।

पैनल प्रमुख चौधरी की प्रतिक्रिया

डेक्कन हेराल्ड ने पैनल प्रमुख चौधरी के हवाले से कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की प्रारंभिक सहमति “एक सकारात्मक कदम” थी, लेकिन बाद में हुई रद्दीकरण “दुखद” है। चौधरी ने यह भी जोड़ा कि पैनल बाद में किसी अन्य तिथि के लिए जेपीसी के साथ संवाद करने के लिए तैयार है, बशर्ता न्यायालय की समय-सीमामा (शेड्युल) की मंजूري मिले。

पिटा न्यायाधीशों की आलोचना

लव लो (Live Law) की रिपोर्ट के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों में शामिल एक पूर्व न्यायाधीशों द्वारा जेपीसी द्वारा बैठक सुरक्षा करने की प्रयास “चिंताजनक” (shocking) बताया गया है. पूर्व न्यायाधीशों, जिन्होने नाम प्रकट करने की मंजूर नहीं दी, के अनुसार, यह प्रकरण शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) और संसदीय न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न्यायिक न

जीडीपीसी, जिसे लोकसभा और राजसभा द्वारा गठित किया गया, संसद द्वारा इस पैनल की प्रभावशीलता की जाँच और विधायी संशोधनों का सुझाव देने का कार्य सौंपा गया था। समिति के अध्यक्ष, सांसद रामेश सिंह, ने पहले ही भारत के मुख्य न्यायाधीश को पैनल के वार्षिक रिपोर्ट पर चर्चा हेतु बैठक का अनुरोध करते हुए पत्र लिखा था।

कानूनी और संवैधानिक संदर्भ

भारत का संविधान न्यायपालिका और विधायिका के बीच स्पष्ट विभाजन को रेखांकित करता है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय संसद समितियों से याचिकाएँ स्वीकार कर सकता है, यह आम तौर पर उनके साथ औपचारिक बैठकें नहीं करता। कानूनी विद्वानों ने चेतावनी दी है कि ऐसे संपर्क संस्थागत सीमाओं को धुंधला कर सकते हैं।

राष्ट्रीय कानून विद्यालय, भारत की प्रोफेसर अनन्या मेहता ने कहा कि न्यायालय का बैठक रद्द करने का निर्णय स्थापित न्यायिक प्रथाओं के अनुरूप है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भविष्य की किसी भी बातचीत को मौजूदा प्रक्रियागत सुरक्षा के भीतर ढाला जाना चाहिए।

निगरानी तंत्र पर प्रभाव

इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि निगरानी निकायों को विधायी निगरानी समितियों के साथ समन्वयित करने में क्या चुनौतियाँ हैं। ओएनओई पैनल का उच्च‑स्तरीय दुराचार की जाँच का दायित्व सरकार की कई शाखाओं के सहयोग पर निर्भर करता है। विलंबित या रद्द संवाद पैनल की सिफारिशों को शीघ्रता से लागू करने की क्षमता को प्रभावित कर

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