उच्च न्यायालय ने जयपुर की यूनेस्को सूचीबद्ध दीवारों वाली नगरी को अवैध कब्जे के खतरे की चेतावनी दी

सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी दी है कि अनियंत्रित अवैध निर्माण गतिविधियाँ जयपुर की विश्व विरासत स्थिति को खतरे में डाल सकती हैं, और उन्होंने अवैध कब्जों की त्वरित हटाने की मांग की है।
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जयपुर — भारत के उच्च न्यायालय ने चेतावनी दी है कि जयपुर के ऐतिहासिक दीवारों से घिरे शहर के आसपास अवैध इमारतों और अवैध कब्जों के निर्माण का जारी रहना इसकी यूनेस्को विश्व विरासत स्थिति को खतरे में डाल सकता है। न्यायालय के इस आदेश, जो 1 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया, की पृष्ठभूमि में शहर के केंद्रीय क्षेत्रों में विरासत संरक्षण प्राधिकारियों द्वारा पहचाने गए अनाधिकृत संरचनाओं की बढ़ती संख्या है।

यूनेस्को स्थिति खतरे में

जयपुर का दीवारों से घिरा शहर, जिसे 2019 से यूनेस्को विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है, अपने अद्वितीय शहरी लेआउट, वास्तुशिल्प विरासत और सांस्कृतिक महत्व के लिए पहचाना जाता है। उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि यूनेस्को और भारतीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा निर्धारित संरक्षण दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वाले अवैध निर्माणों की श्रृंखला के कारण स्थल की अखंडता प्रभावित हो रही है। न्यायालय के निर्देश में विरासत क्षेत्र की दृश्य और संरचनात्मक अखंडता को खतरे में डालने वाले सभी अवैध कब्जों को तुरंत हटाने की मांग की गई है।

उच्च न्यायालय का निर्देश

अपने आदेश में, न्यायालय ने जयपुर नगर निगम और राज्य शहरी विकास विभाग को पुरातत्व सर्वेक्षण भारत (एएसआई) और संस्कृति मंत्रालय द्वारा पहचाने गए अवैध संरचनाओं को गिराने के लिए “सभी आवश्यक कदम” उठाने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने प्राधिकारियों को 30 दिनों के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट जमा करने का भी निर्देश दिया है, जिसमें अवैध कब्जों को समाप्त करने के लिए उठाए गए उपायों और विश्व विरासत संधि के अनुपालन को सुनिश्चित करने के प्रयासों का विवरण दिया गया है।

विरासत प्राधिकारियों के निष्कर्ष

एएसआई के अनुसार, 2026 के अंतिम तिमाही में किए गए एक सर्वेक्षण में दीवारों से घिरे शहर की परिधि के भीतर 200 से अधिक अनाधिकृत इमारतें और वाणिज्यिक बोर्ड्स (होर्डिंग्स) की पहचान की गई थी। एएसआई की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ये संरचनाएं न केवल ऐतिहासिक क्षितिज (स्काईलाइन) को अवरुद्ध करती हैं, बल्कि समीपवर्ती विरासत इमारतों की संरचनात्मक स्थिरता के लिए भी जोखिम पैदा करती हैं। संस्कृति मंत्रालय के संरक्षण दल ने स्थल की पहचान के संरक्षण के लिए इनमें से कई अवैध कब्जों को “गंभीर” (क्रिटिकल) घोषित किया है।

कानूनी और प्रशासनिक प्रतिक्रिया

न्यायालय का यह आदेश जयपुर नगर निगम द्वारा लिए गए कानूनी कार्रवाई की श्रृंखला के बाद आया है, जिसने अवैध संरचनाओं की पहचान और हटाने के लिए एएसआई के साथ काम किया है। शहर की आधिकारिक वेबसाइट द्वारा रिपोर्ट किए गए अनुसार, निगम ने पिछले छह महीनों में 35 अवैध कब्जों को गिरा दिया है। उच्च न्यायालय के निर्देश से इन प्रयासों को तेजी मिलने और हटाने की प्रक्रिया को यूनेस्को के संरक्षण मानकों के अनुरूप लाया जाने की उम्मीद है।

राष्ट्रीय संदर्भ: अतिक्रमण विरोधी पहल

धरोहर स्थलों पर अतिक्रमण एक राष्ट्रीय समस्या है। पुणे में, पुणे नगर निगम के सार्वजनिक कार्य विभाग (PMRDA) ने हाल ही में अतिक्रमण विरोधी दल का गठन किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस दल ने शहर के वाणिज्यिक क्षेत्रों में 1,072 अवैध इमारतों और होर्डिंग्स को हटाया है। जहाँ पुणे की पहल वाणिज्यिक अतिक्रमण पर केंद्रित है, वहीं जयपुर का निर्देश विशेष रूप से धरोहर संरक्षण को लक्षित करता है।

जयपुर के लिए निहितार्थ

यूनेस्को के विश्व धरोहर संधि के तहत सदस्य देशों को सूचीबद्ध स्थलों की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा करना अनिवार्य है। अनुपालन न करने पर किसी स्थल को विश्व धरोहर संकट सूची में शामिल किया जा सकता है या अत्यधिक मामलों में उसे सूची से हटाया जा सकता है। उच्च न्यायालय की चेतावनी स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करती है और जयपुर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता को उजागर करती है।

आगे के कदम

जयपुर नगर निगम से अपेक्षा की जाती है कि वह 30 अक्टूबर 2026 तक उच्च न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करे। रिपोर्ट में हटाए गए अतिक्रमणों की संख्या, ध्वंस की समयसीमा तथा भविष्य में अवैध निर्माण को रोकने के लिए उठाए गए उपायों का विवरण होगा। न्यायालय ने राज्य शहरी विकास विभाग को भी धरोहर क्षेत्र में कड़े निर्माण नियमों को लागू करने का निर्देश दिया है।

निष्कर्ष

उच्च न्यायालय का निर्देश जयपुर के प्राचीन शहर को अनियंत्रित विकास के खतरे से बचाने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। न्यायालय के आदेश का परिणाम

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